प्रबोधनकार ठाकरे: Page 10 of 10

अपने व्याख्यान के माध्यम से उन्होंने लोगों में नई चेतना जगाई। उनकी लेखनी तो निडरता से चल ही रही थी। उस समय बाबासाहेब आंबेडकर का लिया गया इंटरव्यू काफी महत्वपूर्ण था। मतभेद भूलकर एक नहीं हुए तो कांग्रेस , मुंबई सहित महाराष्ट्र कभी नहीं देगी। बाबासाहेब की दी गई यह चेतावनी  काफी सटीक लगी तथी। उसके बाद सभी विरोधी दल संयुक्त महाराष्ट्र समिति में शामिल हुए और इस तरह महाराष्ट्र का निर्माण हुआ। उसके बाद प्रबोधनकार ने सभी सार्वजनिक आंदोलनों से इस्तीफा दे दिया।

 ...और शिवसेना-

 एक सार्वजनिक नवरात्रोत्सव के समय शिकार के लिए घात लगाए  बैठे शेर का विशाल चित्र प्रबोधनकार ने निकाला था। उस चित्र को छोटे बाल और श्रीकांत देख रहे थे। आगे जाकर वही शेर शिवसेना का प्रतीक चिह्न बन गया। सिर्फ यह प्रतीक चिह्न ही नहीं बल्कि शिवसेना यह नाम , जय महाराष्ट्र का घोष वाक्य , ज्वलंत मराठी अभियान की पताका और बहुजनी हिंदुत्ववाद आदि सब कुछ मूलत: प्रबोधनकार का दिया हुआ है। बालासाहेब ने प्रबोधनकार की वाणी , लेखनी और कूची का कौशल्य लिया तो श्रीकांत ने उनके साथ संगीत ले लिया। ' न्यूज डे ' छोडने के बाद कार्टूनिस्ट के रूप में ख्याति प्राप्त करनेवाले बालासाहेब 'शंकर्स वीकली ' की तर्ज पर अंग्रेजी साप्ताहिक निकालने की तैयारी में थे। प्रबोधनकार ने कहा नहीं। मराठी व्यंग्यचित्र साप्ताहिक चाहिए , नाम भी बताया 'मार्मिक''मार्मिक' ने 'शिवसेना' खडी की। उस शिवसेना को मराठी के अभिमान का नारा भी प्रबोधनकार ने दिया। 'शिवसेना' के जन्म से करीब 45 वर्ष पूर्व उन्होंने मुंबई में बढती भीड के बारे में 'प्रबोधन' में लेख लिखा था। इतना ही नहीं तो स्थानीय लोगों को नौकरियां मिलनी चाहिए इस तथ्य पर अंग्रेजी सरकार से मंजूरी भी ले ली थी।

 20 नवंबर, 1973 को प्रबोधनकार का निधन हुआ। उस समय 'शिवसेना' मुंबई में सत्ता में थी। सुधीर जोशी मुंबई के महापौर थे। उनकी अंतिम यात्रा बाबासाहेब आंबेडकर के बाद मुंबई में निकली सबसे बड अंतिम यात्रा थी। घर की चौखट के बाहर चप्पलों का ढेर ही अपनी संपत्ति है , ऐसा अपने बच्चों से कहनेवाले प्रबोधनकार 90 साल की एक सुखद जिंदगी जीते हुए पूर्ण संतुष्टि के साथ थम गए।