प्रबोधनकार ठाकरे: Page 9 of 10

कांग्रेस और हिंदू महासभा से समान अंतर बनाकर रहे।

प्रबोधनकार की हिंदुत्व की नींव गजानन राव वैद्य के हिंदू मिशनरी सोसायटी में पड। सोसायटी ने धर्मांतरित हिंदुओं को फिर से हिंदू धर्म में लाने का काम किया। इसके अलावा वैचारिक दृष्टि से उनका काम महत्वपूर्ण है। लेकिन वैद्य और उनके अनुयायी ब्राह्मणेतर होने के कारण हिंदुत्ववादियों ने उनके काम को हमेशा नजरअंदाज किया। प्रबोधनकार ने हिंदू मिशनरी के रूप में कई साल तक प्रचार किया। गांव-गांव घूमकर व्याख्यान दिए। नागपुर की हिंदू मिशनरी परिषद के वे अध्यक्ष थे। वैद्य द्वारा तैयार की गई वैदिक विवाह पध्दति का उन्होंने संपादन किया। कई लोगों के विवाह में नई विधि के अनुसार पौरोहित्य भी किया। आज भी वैदिक विवाह विधि प्रसिध्द है। हिंदू धर्म के अंधश्रध्दा परंपरा पर तथा आद्य शंकराचार्य से लेकर लोकमान्य तिलक तक के हिंदुत्ववादियों के आदर्श पर प्रहार , उसी तरह ब्राह्मणेतर समाज का नेतृत्व उनकी दृष्टि में हिंदुत्ववाद का ही एक हिस्सा था। उन्होंने पूर्वाग्रह से मुस्लिम तथा ईसाइयों पर कभी आरोप नहीं किया। उनका हिंदुत्ववाद दलितों के खिलाफ नहीं था। उल्टे वे दलितों के समर्थन में लडते थे।

साहित्य

 'वत्तृफ्त्वशास्त्र' (1911) को प्रबोधनकार की पहली पुस्तक मानी जानी चाहिए। इस विषय पर भारतीय भाषा में लिखी गई यह पहली पुस्तक थी। स्वयं लोकमान्य तिलक ने इस पुस्तक की प्रशंसा की। लेकिन उसके पहले भी उन्होंने 'लाइफ एंड मिशन ऑफ रामदास ' (1918) नामक संत रामदास का अंग्रेजी चरित्र लिखा , ऐसा उल्लेख मिलता है। लेकिन वह पुस्तक आज उपलब्ध नहीं। 'भिक्षुकशाहीचे बंड ', ' नोकरशाहीचे बंड अर्थात ग्रामण्याचा साद्यंत इतिहास ' ' दगलबाज शिवाजी ' ऐसी पुस्तकों ने इतिहास की तथा 'शनिमहात्म्य', ' धर्माची देवळे आणि देवळांचा धर्म ', ' हिंदू धर्माचे दिव्य ', ' हिंदू धर्माचा -हास आणि अध:पात ' ऐसी पुस्तकों में धर्म की चिकित्सा की गई। 'पंडिता रमाईबाई सरस्वती ', ' श्रीसंत गाडगेबाबा ', ' कर्मवीर भाऊराव पाटील यांचे अल्पचरित्र ' ये उनकी चरित्रात्मक पुस्तकें हैं।

 

'माझी जीवनगाथा ' यह उनकी स्मृतियों पर लिखी आत्मकथा तो बीसवीं सदी के महाराष्ट्र के इतिहास का अध्ययन करने का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज बन गया है। उनके पूर्व प्रकाशित लेख संग्रह और पुस्तक काफी आए। शाहिर बनकर उनके लिखे दो पोवाडे भी किताब की रूप में देखने को मिलती है। उसमें 'स्वाध्याय संदेश ' और 'उठ मऱ्हाठया उठ ' महत्वपूर्ण पुस्तक हैं। 'खरा ब्राह्मण ', ' टाकलेलं पोर ', ' संगीत विधिनिषेध ', ' काळाचा काळ ', ' संगीत सीताशुध्दी ' नामक नाटकों ने भी इतिहास रचा है। इसके अलावा उन्होंने फिल्में भी लिखीं। आचार्य अत्रे की फिल्म 'श्यामची आई ', ' महात्मा फुले ' और 'माझी लक्ष्मी ' में उन्होंने अभिनय भी किया।

 संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन-

 संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन में प्रबोधनकार ठाकरे , आचार्य अत्रे , भाई माधवराव बागल , ' प्रभात'कार वा.रा. कोठारी और सेनापती बापट इन वरिष्ठ नेताओं को संयुक्त महाराष्ट्र का पंचायतन कहा जाता है। ये किसी भी राजनीतिक दल में नहीं थे। उन्होंने निर्दलीय होकर संपूर्ण आंदोलन का नेतृत्व किया। यह आंदोलन जब लडा जा रहा था। तब प्रबोधनकार 70 साल के थे। उस समय भी