प्रबोधनकार ठाकरे: Page 8 of 10

अपने पितातुल्य समझता हूं। ऐसा कर्मवीर ने प्रबोधनकार के बारे में कहा है। आधुनिक महाराष्ट्र के निर्माता के रूप में कर्मवीर को जाना जाता है। महाराष्ट्र में शिक्षाप्रसार का सबसे बडा काम उन्होंने किया हैं । उनकी संस्था रयत शिक्षा संस्था आजही राज्य की सबसे बडी शिक्षा संस्थान हैं । ऐसा व्यक्ति प्रबोधनकार को अपना गुरु मानता है यह महत्वपूर्ण है।

प्रबोधनकार भाऊराव के साथ अस्पृश्य बोर्डिंग के लिए हरिजन फंड से पैसा लेने के लिए गांधीजी के पास गए थे। तिलकवादियों का वर्चस्व तोडनेवाले महात्मा के रूप में प्रबोधनकार गांधीजी को देखते थे। लेकिन उन्होंने समय-समय पर गांधीजी पर भी प्रहार किया। आप कहते हैं 'आई एम ए बेगर विथ बाऊल ' आप बेगर तो हैं लेकिन रॉयल बेगर हैं और भाऊराव रीयल बेगर हैं। इस तरह का गांधीजी को जवाब देते हुए उन्होंने भाऊराव के लिए प्रतिवर्ष एक हजार रुपए का दान प्राप्त किया था। दो साल बाद अकोला में गांधीजी की सभा न हो ऐसी कोशिश करनेवाले सत्याग्रहियों से बचाते हुए गांधीजी को सभास्थल तक पहुंचाने का पराक्रम भी किया। बहुत समय बाद गांधीजी को महात्मा की बजाय मिस्टर ऐसा संबोधन करने आग्रह था इसलिए उन्होंने नथूराम गोडसे के 'अग्रणी' पत्रिका में लिखना बंद कर दिया।

सार्वजनिक नवरात्री उत्सव के प्रणेता-

 पुणे से मुंबई लौटने के बाद 1926 में दादर के गणपति उत्सव में उन्होंने करिश्मा दिखाया। ब्राह्मणेतर समाज का आग्रह था कि गणपति की पूजा किसी अस्पृश्य के हाथों हो। लेकिन गणपति मंडल के ब्राह्मण नेता इसके लिए तैयार नहीं थे। उस समय प्रबोधनकार ने ऐलान किया कि 'समस्या का समाधान नहीं निकाला गया तो मैं गणपति तोड डालूंगा। ' उसके बाद डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर , रावबहादुर बोले की मध्यस्थता से तय हुआ कि दलित नेता मडकेबुआ के हाथ से फूल लेकर ब्राह्मण पुजारी उसे भगवान के चरणों में अर्पित करेगा , लेकिन अगले साल से भी दादर का गणेशोत्सव बंद हो गया। ठाकरे ने गणपति बंद कराया ऐसा शोर मचने लगा। इसलिए सार्वजनिक नवरात्रि उत्सव का प्रारंभ किया। गुजराती गरबा और बंगाली दुर्गापूजा ये पहले से होंगे , लेकिन देवी की मूर्ति लाकर महाराष्ट्रीय पध्दति से नवरात्रि शुरू करने का श्रेय प्रबोधनकार को ही जाता है। लेकिन उन्होंने ऐसा प्रमाण दिया कि इस प्रकार का उत्सव शिवकाल में होता था। जो पेशवाकाल में बंद हो गया। लोकहितवादी संघ की स्थापना कर दादर में आज स्थित तिलक पुल के पास के मैदान में यह उत्सव मनाया गया। इसमें पालघर से लेकर कुलाबा तक का ब्राह्मणेतर समाज शामिल हुआ। अगले साल ही वह पूरे महाराष्ट्र में फैल गया। आज भी प्रबोधनकार का शुरू किया गया उत्सव खांडके चाल में जारी है।

बहुजनवादी हिंदुत्व का मूल पुरुष

 हिंदुत्ववाद और बहुजनवाद में समन्वय साधने का श्रेय प्रबोधनकार को जाता है। हिंदुत्व की आड में ब्राह्मण का लाभ उठानेवाले लोगों का उन्होंने विरोध किया वे स्वयं हिंदुत्ववादी थे , लेकिन उनकी नींव बहुजनवादी थी। उन्हें बहुजनवादी हिंदुत्व का मूल पुरुष माना जाना चाहिए। ब्राह्मणेतर आंदोलन के समय कांग्रेस की तरफ नहीं जानेवाले कई बत्रडे नेता न.चिं. केळकर और सावरकर के प्रभाव के कारण हिंदू महासभा की तरफ गए। लेकिन प्रबोधनकार का आंदोलन हमेशा स्वतंत्र रहा। वे