प्रबोधनकार ठाकरे: Page 7 of 10

निपुण प्रबोधनकार को तब ब्रिटिश सरकार ने 'प्रबोधन' निकालने के लिए विशेष छूट दी। लेकिन अपने विचारों की स्वतंत्रता का संकोच होता है , ऐसा लगने पर उन्होंने सरकारी नौकरी से इस्तीफा दे दिया। सामाजिक सुधारों को सफेदपोश समाज से आगे ले जाकर उसे बहुजन समाज तक पहुंचानेवाले प्रबोधन आगरकर के 'सुधारक' से भी कुछ कदम आगे चले गए थे। ऐसा मराठी अखबारों का इतिहास लिखते समय रा.के. लेले कहते हैं। प्रबोधनकार की शैली के बारे में वे कहते हैं 'उनकी वाणी तथा लेखनशैली का जोड महाराष्ट्र में मिलना मुश्किल है। वे सिर्फ चिकोटी ही नहीं बल्कि तीखा प्रहार करते हैं। पढनेवाले के तन-बदन में आग लग जाए ऐसी उनकी भाषा थी। लेकिन वह अधिक आसान और विशुध्द मराठी होती। ' महाराष्ट्र में 'प्रबोधन' की बिक्री और प्रभाव प्रचंड था। उसने अपने पांच-छह साल के कार्यकाल में ही बहुजनवादी पत्रकारिता को मान्यता , पहचान और विचारों की प्रौढता प्रदान कर दी। इसीलिए 'प्रबोधन' बंद होने के बाद भी 'प्रबोधनकार' यह नाम उनके साथ सम्मान के साथ लग गया। आगरकर का व्रत पूरा करने के लिए उन्होंने पुणे में 'लोकहितवादी' नाम का साप्ताहिक भी सालभर चलाया। 'प्रबोधन' बंद होने के बाद उन्होंने अपना स्वयं का पत्र नहीं निकाला , लेकिन वे हमेशा लिखते रहे। मालती तेंडुलकर के 'प्रतोद' के वे सालभर तक संपादक थे। 'कामगार समाचार ' से लेकर 'अग्रणी' तक तथा 'विजयी मराठा ' से 'कंदील' तक कई सामयिक पत्रों में वे लिखते रहे। 'नवा मनू ' में 'तात्या पंतोजीच्या घडया ', ' पुढारी' में 'शनिवारचे फुटाणे ' नवाकाल में 'घाव घाली निशाणी ' लोकमान्य में 'जुन्या आठवणी ' तथा 'बातमीदार' में 'वाचकांचे पार्लमेंट ' ऐसे कई कॉलम उनके प्रसिध्द थे। आखिरी समय वे प्रमुखता से 'मार्मिक' के लिए लिखते थे।

कर्मवीर का गुरु-

ब्राह्मणेतर आंदोलन के लिए जब वे सातारा घूम रहे थे तो उनकी मुलाकात भाऊराव पाटील से हुई। भाऊराव भी प्रबोधनकार की ही तरह सेल्समैन। वो टाई-कोट पहनकर किर्लोस्कर के हल बेचते थे। लेकिन अस्पृश्यों को शिक्षा देने के लिए वह रयत शिक्षण संस्था चलाते थे। उनके काम की सारी रूपरेखा प्रबोधनकार के साथ दादर के खांडके बिल्डिंग में तैयार हुई। सातारा में हल का कारखाना शुरू करने और उसमें से मिलनेवाले पैसे पर बोर्डिंग खड करने की योजना थी। उसके लिए उद्योगपति खानबहादुर धनजी कूपर ने पाडली में कारखाना शुरू किया। वहां पर छापखाना शुरू करने के लिए प्रबोधनकार भी पहुंचे। लेकिन इस कारखाने से न बोर्डिंग को पैसे मिले और न ही 'प्रबोधन' लंबे समय तक छपा। कर्मवीर भाऊराव पाटील के काम में जब भी समस्या हुई तब प्रबोधनकार उनके साथ खडे थे। बोर्डिंग के बच्चों के लिए घर-घर जाकर अनाज भी मांगा। रयत शिक्षण की कल्पना भले ही मेरी हो लेकिन उस बीज को चेतना , स्फूर्ति और उत्साह का पानी डालकर उसे अंकुरित करनेवाले और प्रारंभ में ढांढस देकर विरोधियों का पर्वत तोडकर राह दिखानेवाले मेरे गुरु सिर्फ प्रबोधनकार ठाकरे थे। वे मेरे सच्चे गुरु हैं। लेकिन मैं उन्हें