प्रबोधनकार ठाकरे: Page 6 of 10

जैसे लोगों को ऐसा विषय कहां से सूझता है ? कोई जाति श्रेष्ठ साबित होने से अपनी जाति छोटी नहीं हो जाती। मैं इस चेक पर थूकता हूं। ' छत्रपति ने परीक्षा लेने के लिए यह सब किया था। तब महाराज ने सर्टिफिकेट दिया कि 'ही इज ए ओन्ली मैन वी हेव कम अक्रॉस हू कैन नॉट बी बॉट ऑर ब्राइब्ड। '

छत्रपति जहां-जहां गलती करते थे। प्रबोधनकार उस पर तीखा प्रहार करते थे। 'प्रबोधन' के दूसरे अंक में उन्होंने 'अंबा बाईचा नायटा ' ( अंबा बाई का खसरा) नामक लेख लिखा। कुछ मराठा बच्चों ने अंबाबाई के मंदिर में जाकर पूजा की थी। उसके बदले उन बच्चों को शाहू ने सजा दी थी। इसलिए प्रबोधनकार की लेखनी का प्रसाद उन्हें चखना पडा। क्षत्रिय शंकराचार्य बनाने के मामले में भी प्रबोधनकार ने शाहू को ठोंका था। ऐसा होने के बावजूद प्रबोधनकार के प्रति शाहू का स्नेह बरकरार था। एक रात दादर क्षेत्र में एक गाड 'धनुष' को ढूंढ रही थी। शाहू महाराज प्रबोधनकार को 'धनुष' नाम से पुकारते थे। वो प्रबोधनकार के पास आए और शाहू महाराज के पास ले गए। रात बहुत हो गई थी। महाराज बीमार थे। छत्रपति प्रताप सिंह और रंगो बापूजी का इतिहास लिखेंगे , ऐसी कसम छत्रपति ने अपने हाथ में मेरा हाथ लेकर दी। सुबह महाराज की मृत्यु की खबर आई।

प्रबोधनकार की पत्रकारिता-

बचपन में जब पनवेल में थे उसी समय प्रबोधनकार को पॉकेट इनसाइक्लोपीडिया नाम की एक छोटी पुस्तक मिली थी। उसी की कुछ जानकारी का अनुवाद कर उस समय उन्होंने उसे प्रकाशित करने के लिए हरिभाऊ ना. आप्टे के 'करमणूक' के लिए भेज दिया। वह लेख उसमें प्रकाशित किया गया। हरिभाऊ ने पत्र भेजकर कुछ और लेख मंगाए। इस तरह प्रबोधनकार के लेखन का प्रारंभ हुआ। केरल कोकिलकार कृष्णाजी नारायण आठल्ये ने पनवेल में प्रबोधनकार को लेखन और पत्रकारिता का ज्ञान दिया। उसके पहले छात्र जीवन में भी 'विद्यार्थी' नामक एक साप्ताहिक का प्रारंभ किया था। उसके लिए उन्होंने एक घरेलू छपाई मशीन भी बनाई । एक सप्ताह में 50 अंक छपते थे। 4-5 माह चला। लेकिन प्रत्यक्ष रूप से उनके हाथ में स्याही उस समय लगी जब वो मुंबई के 'तत्व विवेचक ' छापखाने में गए। 1908 में वे वहां सहायक प्रूफरीडर थे। उन्होंने वहां रहते हुए छद्म नामों से विभिन्न पत्रिकाओं के लिए लिखा। 'तर' नाम से वह 'इंदुप्रकाश' और ठाणे के 'जगत्समाचार' अखबार में लिख रहे थे। उसके बाद जलगांव में उन्होंने 'सारथी' नामक की पत्रिका सालभर चलाई।

उनकी लेखनी को धार 'प्रबोधन' के कारण मिली। 16 अक्टूबर , 1921 को इस पत्रिका का प्रारंभ हुआ। ब्राह्मण , ब्राह्मणेतर विवाद में नए विवादों को जन्म देने के लिए और आरोपों का जवाब देने के लिए उन्हें अपना खुद का सामयिक पत्र चाहिए था।

A fortnightly Journal; devoted to the Social, Religious and Moral Regeneration of the Hindu Society  ऐसा ध्येय रखनेवाले प्रबोधनकार राजनीति के विरोधी नहीं थे। उस समय सरकारी नौकर को भी स्वयं का पत्र निकालने की अनुमति नहीं होती थी। लेकिन अपने काम में अत्यंत