प्रबोधनकार ठाकरे: Page 5 of 10

पर सत्य को दबाकर ब्राह्मणेतरों के स्वाभिमान को कुचलने का यह प्रयास पेशवाई के दौर से ही लगातार जारी था। राजवाडे की इतिहास संशोधन के तपश्चर्या की इतनी दादागीरी थी कि कोई उनका विरोध करने की हिम्मत नहीं जुटा पाता। ऐसे में 33 वर्षों का एक तरुण ताल ठोंककर खडा हो गया , प्रबोधनकार सामने डट गए। उन्होंने 'कोदण्डाचा टणत्कार अर्थात् भारतीय इतिहास संशोधन मंडळास उलट सलामी ' नामक प्रज्वलंत पुस्तक लिखी। उसमें उन्होंने मराठेशाही के दौरान ब्राह्मणेतरों के उज्ज्वल कार्यों और मराठेशाही के ह्रास में ब्राह्मणों की जातिवाद की जिम्मेदारी का उत्तम विश्लेषण किया। यह इतना सप्रमाण था कि राजवात्रडे उनका उत्तर ही नहीं दे पाए। परिणामस्वरूप ब्राह्मणवादी इतिहास पध्दति को आखिरी कील ठोंक उठी और मराठों के नए इतिहास लेखन की परंपरा प्रारंभ हो गई।

सिर्फ पुस्तक लिखकर ही प्रबोधनकार शांत नहीं बैठे। वे उसके प्रचारार्थ नागपुर से बेलगांव तक घूमे। वे इसी दौरान ब्राह्मणेतर आंदोलन की ओर आकर्षित हुए। ब्राह्मणेतर वैचारिक नेतृत्व की कमी की उन्होंने भरपाई की और महात्मा फुले के सत्यशोधक आंदोलन को नए सिरे से खडा करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। आगे चलकर उन्होंने सातारा की गद्दी के आखिरी छत्रपति प्रताप सिंह की तत्कालीन ब्रिटिशवादी ब्राह्मण सरदारों द्वारा किए गए अपमान और उससे हुए अंत की कहानी को सार्वजनिक किया। इसी से पश्चिम महाराष्ट्र में ब्राह्मणेतर आंदोलन की नींव पड। पुणे में उनके निवास के दौरान इस आंदोलन को तेज प्राप्त हुआ। केशवराव जेधे और दिनकरराव जवलकर नामक युवकों के साथ प्रबोधनकार के आने के चलते ब्राह्मणवादी आंदोलन को बट्टा लग गया। लोकमान्य तिलक के सुपुत्र श्रीधर पंत और रामभाऊ ने भी गायकवाड वात्रडे के गणपति में अस्पृश्यों को साथ लिया। वहीं समता सैनिक संघ की स्थापना हुई। जाति भेद खत्म कर हर किसी को एक पंगत मिली। इस सबमें महत्वपूर्ण प्रेरणा प्रबोधनकार की थी। परिणामस्वरूप उनके खिलाफ बहिष्कार , घर के सामने मरा हुआ गधा डालने , उनके मृत्यु की झूठी अफवाहें फैलाने जैसे त्रास दिए गए। लेकिन वे इन सब पर भी भारी पत्रडे।

राजर्षि का धनुष्य

उस समय ब्राह्मणेतर समाज का नेतृत्व छत्रपति शाहू महाराज कर रहे थे। प्रबोधनकार भी गांव-गांव घूमकर व्याख्यान दे रहे थे। साथ ही हर जगह के कागजात में उस गांव का इतिहास भी ढूंढ रहे थे। वेदोक्त मामले में ब्राह्मणों के अखबार में होनेवाली टिप्पणी का उन्हीं की भाषा में जवाब देने के लिए महाराज को भी एक कलम बहादुर की जरूरत थी। इन दो महापुरुषों में पहली ही मुलाकात में अटूट स्नेह बन गया। वेदोक्त पुराणोक्त विवाद हो या फिर छात्र जगद्गुरु पीठ की स्थापना का मामला हो , प्रबोधनकार ने जिस प्रकार की ऐतिहासिक जानकारी छत्रपति को दी। उससे उन्हें काफी मदद मिली। प्रबोधनकार जब 21 साल के थे तब उन्हें निमोनिया (टायफाइड) हो गया। यह बीमारी तीन महीने तक रही , जिसके कारण वेतन भी नहीं मिला। पैसे की समस्या खड हो गई। ऐसे ही समय एक वकील शाहू महाराज की एक चिट्ठी लेकर आया। एक विषय पर पुराण के आधार पर ग्रंथ लिखने के लिए पांच हजार रुपए का चेक उस पत्र के साथ था। लेकिन उस पर प्रबोधनकार ने जवाब दिया 'पुराण मतलब फाग , ऐसा माननेवाला मैं जरूर हूं। छत्रपति