प्रबोधनकार ठाकरे: Page 4 of 10

में दस वर्षों तक सरकारी नौकरी भी की। उनके जीवन का यही स्थैर्यकाल था। इसके अलावा तो वे आजन्म दौड-भाग कर संघर्ष करते रहे। पत्रकारिता , लेखन और छपाई उनकी आय के प्रमुख स्रोत थे।

नाटक कंपनी में काम करते समय गुप्ते की रमा से विवाह हुआ। जनवरी , 1910 की बात है और स्थान था अलीबाग के निकट बरसोली गांव। दादर में एक बार बसेरा डाला , तो बांद्रा के मातोश्री बंगले में जाने तक वहीं रहे। इस बीच वे भिवंडी से लेकर अमरावती तक गृहस्थी जमाने की दौड-भाग में लगे रहे। उन्हें कुल दस बच्चे हुए। चार बेटे और छह बेटियां। इसके अलावा राम भाऊ हरणे और विमलताई को अपने बच्चों की तरह ही पाला भी। बालासाहेब 'मार्मिक' के बाद स्थिर स्थावर हुए। तब जाकर बुढापे में उनके आय का संघर्ष थमा।

आंदोलन

प्रबोधनकार का पहला आंदोलन अंग्रेजी विद्यालय में पढाई के दौरान हुआ। गाडगिल नाम के एक अपंग व्यक्ति उत्तम शिक्षक थे। अस्थायी होने के चलते उन्हें सेवा से निष्कासित कर दिया गया। उनके लिए कक्षा पांच में पढ रहे केशव ने विद्यार्थियों का हस्ताक्षरयुक्त ज्ञापन महानगरपालिका में दिया और अपने शिक्षक की नौकरी बचाई। बाल्यावस्था में ही वे बाल विवाह में भोजन करते समय 'मुद्दामहून म्हातारा इतुका न अवधे पाऊणशे वयमान ' पद गाते थे। अपने ही उम्र की यानी दस-बारह वर्ष उम्र वाली मंजू का जब उन्होंने 65 वर्षीय बूढे से विवाह होते देखा तो विद्रोह स्वरूप शादी का मंडप ही जला दिया।

'प्रबोधन' के प्रकाशन के दौरान ही दादर की खांडके बिल्डिंग में स्वाध्याय आश्रम की शुरुआत हुई। प्रबोधन के अंकों की पैकिंग के लिए हर माह दो बार अनेक युवकों को वे रतजगा कराते। वे सारे लोग प्रबोधनकार की देख-रेख में तैयार हो गए। उसी से निकला 'स्वाध्याय आश्रम ' और ' गोविंदाग्रज मंडल '। इन संस्थाओं ने व्याख्यानों के आयोजन और पुस्तकों के प्रकाशन का काम तो किया है साथ ही साथ दहेज विध्वसंक संघ का काम बडे पैमाने पर खडा किया। जहां कहीं दहेज लेकर विवाह होने का उन्हें पता चले ये युवक वहां प्रदर्शन करने पहुंच जाते। गधे की बारात निकालते और दहेज लौटाने के लिए बारातियों को मजबूर करते। इसमें से ढेर सारे कार्यकर्ता आगे चलकर डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के आंदोलन में अग्रणीय रहे। महिला उत्थान के काम में भी प्रबोधनकार हमेशा आगे रहते। महिलाओं के शिक्षण के लिए उनका जबरदस्त आग्रह रहता। गोवा की देवदासी पध्दति को कानूनी रूप से प्रतिबंधित करने के लिए वहां के गवर्नर जनरल को जो पहला ज्ञापन दिया गया वह प्रबोधनकार के नेतृत्व में दिया गया। उन्होंने बीस-पच्चीस विधवा विवाहों का भी आयोजन किया।

ब्राह्मणेतर आंदोलन

प्रबोधनकार को बुकबाजी का व्यसन था। उनका पिंड आंदोलनकारी का था। क्रांतिकारी विचारों का संस्कार उन्हें घर से ही प्राप्त हुआ था। लोकहितवादी , महात्मा फुले और इंगरसॉल के पठन-पाठन से उनकी वैचारिक नींव पक्की हो गई। इसी दौरान राजवाडे प्रकरण का उद्गम हुआ। भारतीय इतिहास संशोधन मंडल के चौथे वर्ष का अहवाल लिखते समय इतिहासाचार्य वि. का. राजवाडे ने मराठेशाही के ह्रास के लिए ब्राह्मणेतर और उसमें भी विशेषकर कायस्थों को जिम्मेदार ठहराया। यह सत्य नहीं था। इतिहास संशोधन के नाम