प्रबोधनकार ठाकरे: Page 3 of 10

बजाय उन्होंने अपने आयुष्यमान को झोंक दिया। उन्होंने तमाम तरह के कारोबार किए , उन सबका मूल सीताराम की सीख में था। गांव में आग लगे तो सबसे पहले अपना सर्वस्व बिसारकर सीताराम पंत आगे दौडते थे। गांव में प्लेग आया तब भी सीताराम इसी तरह अगुवाई करते थे। इसी प्लेग ने सीताराम को ही अपना शिकार बना लिया। जब पिता दिवंगत हुए तब प्रबोधनकार की उम्र थी केवल 16-17 साल की। पिता की तुलना में मां का प्रभाव ज्यादा महत्वपूर्ण था। उन्होंने प्रबोधनकार को अध्ययन और स्वाभिमान का संस्कार दिया। पिताजी को लॉटरी लगी। उस समय उनकी पगार हुआ करती थी पंद्रह रुपए और लौटरी लगी थी पचहत्तर रुपयों की। मां ने कहा- 'हमें तो अपने मेहनत की रोटी चाहिए। ' राजनीतिक कार्यकर्ता बनकर हराम का हफ्ता मांगनेवालों से ये कौन कहेगा ? मां ने उन्हें वाचन विशेषकर समाचार-पत्र पढने की आदत लगा दी। इसी से मराठी पत्रकारिता को नया अध्याय देनेवाला पत्रकार जन्मा।

ठाकरे की जाति सीकेपी यानी चांद्रसेनीय कायस्थ प्रभु। बचपन में किसी ब्राह्मण सहपाठी से पानी मांगा तो वह तपेले से पानी ले आता था। वह चौखट के नीचे खडा कर अंजुलि से पानी पिलाता था। मित्र की मां वह तपेली बिना धोए घर के अंदर नहीं ले जाने देती थी। शुरू में प्रबोधनकार इसे नहीं समझ पाते थे। जब समझ में आया तो उन्होंने इस अस्पृश्यता का मजाक उडाना शुरू किया और वे यह मजाक आजन्म उडाते रहे। पिता की कचहरीवाली मंडली के एक ब्राह्मण बेलिफ के घर धुनधुरमास के निमित्त प्रात:भोजन का कार्यक्रम था। पिता के साथ केशव भी गए थे। उस समय ब्राह्मणों की एक पंगत थी और दूसरी पंगत थी इन दोनों ठाकरे की। भालेराव नाम का तीसरा कारकून तीसरी पंगत में बैठा था। परोसनेवाली महिलाएं भोजन ऊपर से डालती थीं। भोजन होने के बाद पिता दोनों के बर्तन स्वयं साफ करने लगे। इस पर केशव चिढ गया। ये ब्राह्मण अगर हमसे अलग तरीके से पेश आते हैं तो हम इन्हें अपनत्व का आदर क्यों दें ? प्रबोधनकार के ये बागी तेवर उनकी उम्र के आठवीं वर्ष में थे।

आजन्म संघर्ष

पिता की नौकरी छूटने और पनवेल में आगे की शिक्षा का प्रबंध न होने के चलते उनका शिक्षण थम गया। परिणामस्वरूप कभी बारामती तो कभी मध्य प्रदेश के देवास में उनकी दौडधूप हुई। फीस उनके लिए डेढ रुपया कम पडने के चलते वे मैट्रिक की परीक्षा नहीं दे पाए और वकील बनने का उनका स्वप्न अधूरा रह गया। उसी समय से साइन बोर्ड रंगने , रबर स्टैंप बनाने , बुक बाइडिंग , दीवार रंगने , फोटोग्राफी, मशीन मैकेनिक आदि का उद्योग उन्होंने किया। उनका जीवन ध्येय था कि जब हुनरमंद हैं तो बेकारी किसलिए।

कभी नाटक कंपनी तो कभी सिनेमा कंपनी में काम किया। कभी गांव-गांव घूमकर ग्रामोफोन बेचा। कभी बीमा कंपनी का प्रचार किया। कभी स्कूल में शिक्षक का काम तो कभी इंग्लिश स्पीकिंग का क्लास चलाया। निजी कंपनी में सेल्समेन और पब्लिसिटी ऑफीसर के रूप में तो वे विख्यात हुए। कई बार तो पत्रकारों को वक्ताओं के भाषणों की प्रति लिखकर दी। चुनावी उम्मीदवारों के घोषणा-पत्र लिखे। पीडब्ल्यूडी में शॉर्टहैंड टाइपिस्ट से रिकॉर्ड सेक्शन के हेड क्लर्क के रूप