प्रबोधनकार ठाकरे: Page 2 of 10

का पाली है। पाली के अष्टविनायक ही ठाकरे के कुलदेवता होने का उल्लेख मिलता है। उनके दादा भिकोबा धोडपकर देवीभक्त साधु पुरुष थे। लेकिन उनमें शाक्तों की सिध्दि परंपरा के पीछे लगनेवाला मानवीय दोष नहीं था। बल्कि उन्होंने 22 वर्षों तक पंढर पूर की वारी के चलते निस्पृह लोकसेवा के व्रत का अखंड पालन किया। उन दिनों कुछ लोगों ने पैसे कमाने के चलते प्लेग देवी बनाई थी। वह भैंसे पर बैठकर गांव-गांव घूमकर पैसे जमा करती। भिकोबा उर्फ तात्या अपना आंगन बुहार रहे थे तभी वह उनके सामने भी आई। उन्होंने अपने हाथ की झात्रडू को सिर्फ जमीन पर पटका और प्लेग देवी पेट में मरोड आई , यह कहते हुए चीखने लगी। प्रबोधनकार में अंधश्रध्दा पर प्रहार करने का संस्कार यहीं से प्रारंभ हुआ।

मां के पिता बाबा पत्की प्रख्यात कानूनविद थे लेकिन उनका पिंड था शिवोपासना और जन सेवा। वर्तमान पनवेल के पहले हार्बर लाइन पर एक स्टेशन है खांदेश्वर। इस खांदेश्वर की स्थापना बाबा पत्की ने ही की थी। प्रबोधनकार ने रैशनलिजम और श्रध्दा के बीच जो संतुलन साधा और प्रश्न किया कि 'मंदिर का धर्म होना चाहिए या धर्म का मंदिर। ' उन्हें इस तरह का संतुलन साधने का प्रभाव बाल्य संस्कार से ही प्राप्त हुआ। उन्होंने श्रध्दा की खाल खींची लेकिन वे कभी श्रध्दाविहीन नहीं हुए। इन दोनों से भी अधिक प्रभाव उन पर पडा बय यानी आजी का। पिता की माता। उन्होंने जाति-धर्म की मर्यादा को लांघकर 60 वर्ष दाई का काम किया। प्रबोधनकार कहते हैं कि मैं आजन्म जात-पांत और दहेज का विरोध कर पाया उसकी प्रेरणा बय (आजी) ने दी। विद्यालय से लौटते समय एक महार की परछाई छोटे केशव के शरीर पर पडी। केशव अब अस्पृश्य हो गया , ऐसा ब्राह्मणों के बच्चे चीखने लगे। वै ने उनकी चीख सुनी। उन्होंने उनमें से एक अभ्यंकर नामक बच्चे को आगे खींचा। उसकी परछाई केशव पर डाली और कहा यदि महार की परछाई से कोई महार बनता है तो ब्राह्मण की परछाई से हमारा दादा अब ब्राह्मण हो गया। आनेवाले दिनों में महार जाति का एक सूबेदार गांव में रहने के लिए आया। अंग्रेजी की पांचवीं कक्षा में पढ रहे प्रबोधनकार उसके घर जाकर चाय पीया करते थे। परिणामस्वरूप गांव में बखेडा खडा हो गया। शिकायतें जब आने लगीं तो बय ने जवाब दिया तुम्हारी तरह दारू पीने की बजाय महार के घर की चाय पीना बुरा नहीं। बलि प्रतिपदा के दिन महारन पुकारती थी 'इडा-पीडा टले बलि का राज्य आए ', उस समय उन्हें ठाकरे के घर के ओटे पर रंगोली के पीढे पर बैठाकर दीये से परछन ली जाती थी। उसके बाद उन्हें उनकी दीवाली दी जाती थी। यह संस्कार महत्वपूर्ण था। बय अपने वृध्दावस्था में दादर में निवास के दौरान दिवंगत हुईं। उस समय हिंदुओं की सभी जातियों के साथ-साथ मुसलमानों और ईसाइयों ने भी उन्हें कंधा दिया।

पिता सीताराम पंत उर्फ बाळा इसी प्रकार सबकी मदद के लिए आगे बढनेवाले व्यक्ति थे। नौकरी चली गई तब भी बिना घबराए अपनी मर्यादा का पालन करते हुए उन्होंने छोटे उद्योग धंधे किए। उसका प्रबोधनकार पर बडा प्रभाव पडा। सफेदपोशों की तरह 9 से 5 की डयूटी कर परोपजीवी होने की